अहोई अष्टमी पूजा सामग्री | Ahoi Ashtami Puja Samagri PDF in Hindi

Ahoi Mata Ji

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। इस व्रत को महिलाएं अपनी – अपनी संतानों की रक्षा के लिए करती हैं। इस व्रत में अहोई माता की पूजा पूर्ण विधि – विधान से एवं श्रद्धापूर्वक की जाती है।

यदि कोई भी माता अहोई अष्टमी व्रत का विधिपूर्वक पालन करना चाहती हैं तो उन्हें पूजन के लिए कुछ विशेष पूजा सामग्री की आवश्यकता अवश्य होती है। अगर वह इस सामग्री को पूजन से पूर्व एकत्रित कर लेती हैं तो उन्हें पूजन के समय किसी भी प्रकार की असुविधा या समस्या नहीं होती है।

मान्यता है कि इस व्रत को करने से अहोई माता प्रसन्न होती हैं और नि:संतान को भी संतान प्राप्ति का वरदान देती हैं। इस व्रत को करने वाली माताओं की संतानें दीर्घायु होती हैं और उन्हें अच्छा स्वास्थ्य और सुख समृद्धि की भी प्राप्ति होती है।

 

अहोई अष्टमी की पूजा सामग्री लिस्ट PDF / Ahoi Ashtami Puja Samagri List PDF

  • अहोई माता मूर्ति/चित्र
  • स्याहु माला
  • दीपक करवा
  • पूजा रोली
  • अक्षत
  • तिलक के लिए रोली
  • दूब
  • कलावा
  • पुत्रों को देने के लिए श्रीफल माता को चढ़ावे के लिए श्रृंगार का सामान बयाना
  • सात्विक भोजन
  • चौदह पूरी और आठ पुओं का भोग
  • चावल की कटोरी,
  • मूली
  • सिंघाड़े
  • फल
  • खीर
  • दूध व भात
  • वस्त्र
  • बयाना में देने के लिए नेग (पैसे)

 

अहोई माता की कहानी / Ahoi Mata Ki Kahani

प्राचीन काल में एक साहुकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी। इस साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली के अवसर पर ससुराल से मायके आई थी I दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई तो ननद भी उनके साथ जंगल की ओर चल पड़ी। साहुकार की बेटी जहां से मिट्टी ले रही थी उसी स्थान पर स्याहु (साही) अपने साथ बेटों से साथ रहती थी। खोदते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी ने खुरपी से स्याहू का एक बच्चा मर गया। स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।

स्याहू की यह बातसुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभीयों से एक एक करके विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे थे वह सभी सात दिन बाद मर जाते हैं। सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा। पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।

सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है। रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं। अचानक साहुकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है। इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है। इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है। छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है। गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है।

स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहुएं होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहु का घर पुत्र और पुत्र की वधुओं से हरा भरा हो जाता है। अहोई अष्टमी का अर्थ एक प्रकार से यह भी होता है “अनहोनी को होनी बनाना” जैसे साहुकार की छोटी बहू ने कर दिखाया था।

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